हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामी देशों में युद्ध की स्थिति को देखते हुए कुछ लोग नहजुल बलाग़ा का गलत संदर्भ देकर गलतफहमियों का शिकार हो सकते हैं। ऐसी परिस्थितियों में युद्ध और शांति के संबंध और उन मूल्यवान ग्रंथों से लाभ उठाने की सीमाओं के बारे में भी प्रश्न उठाए जाते हैं।
इसी सिलसिले में नहजुल बलाग़ा का यह कथन कि "यदि दुश्मन तुम्हें शांति का आह्वान करे तो उसे स्वीकार करो", भी उन्हीं प्रश्नों का केंद्र बना। इसलिए हमने नहजुल बलाग़ा के विशेषज्ञ हुज्जतुल-इस्लाम मुस्तफ़ा ज़हराई से साक्षात्कार किया ताकि उनसे इन प्रश्नों के उत्तर जान सकें। नीचे उनकी बातचीत का सारांश प्रस्तुत है:
प्रश्न: क्या यह वाक्य "यदि दुश्मन तुम्हें शांति का आह्वान करे तो उसे अस्वीकार न करो" वास्तव में नहजुल बलाग़ा में मौजूद है? यदि है तो किस भाषण, पत्र या हिकमत में?
उत्तर: बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्राहीम
जी हाँ! यह वाक्य नहजुल बलाग़ा में मालिक अश्तर के नाम हज़रत अली के पत्र में इस प्रकार आया है: "दुश्मन की ओर से जो शांति की पेशकश आए, बशर्ते कि अल्लाह उससे प्रसन्न हो, उसे अस्वीकार न करो।"
इमाम (अ) की यह नसीहत बहुत गहरे बिंदुओं और मामलों को समेटे हुए है, जिन पर यदि ध्यान न दिया जाए तो इससे क़ुरआन की आयतों और अमीरुल मोमिनीन के अन्य कथनों के विपरीत अर्थ समझे जा सकते हैं।
हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली (अ) ने फरमाया कि "उस शांति को स्वीकार करो जिससे अल्लाह प्रसन्न हो।" इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक शांति अल्लाह की प्रसन्नता का कारण नहीं बनती, जैसा कि सूरह मुहम्मद की आयत 35 में फरमाया गया है: «فَلَا تَهِنُواْ وَتَدعُوٓاْ إِلَی ٱلسَّلمِ وَأَنتُمُ ٱلأَعلَونَ وَٱللَّهُ مَعَکُم...» "जब तुम दुश्मन के साथ युद्ध की स्थिति में हो तो कमज़ोरी न दिखाओ और शांति का आह्वान न करो, जबकि तुम प्रभावी हो और अल्लाह तुम्हारे साथ है।"
लेकिन जब दुश्मन की शक्ति कमज़ोर हो जाए तो उनमें से बचे हुए लोग और उनके समर्थक संभव है शांति की पेशकश करें। यहाँ शांति स्वीकार करना वांछित होगा क्योंकि ऐसी स्थिति में शांति का अर्थ है कि युद्ध भी बंद हो और दुश्मन इस बात का पाबंद हो जाए कि वह दोबारा अत्याचार और ज़ुल्म नहीं करेगा और संभव है कि वह हर्जाना आदि भी अदा करे।
यह वही शांति है जिसके बारे में अमीरुल मोमिनीन (अ) ने फरमाया: "यदि तुम्हारे दुश्मन की ओर से ऐसी शांति की पेशकश आए जिसमें अल्लाह की प्रसन्नता हो तो उसे स्वीकार करो।"
ऐसी शांति जो प्रतिरोध का परिणाम है, शांति, आसानी और सुकून का कारण बनेगी। इसीलिए इमाम अली (अ) ने आगे फरमाया: فَإِنَّ فِی اَلصُّلْحِ دَعَةً لِجُنُودِکَ وَ رَاحَةً مِنْ هُمُومِکَ وَ أَمْناً لِبِلاَدِکَ.. "क्योंकि शांति में तुम्हारे लश्कर के लिए आराम और नई ताकत है, तुम्हारी परेशानियों से सुकून है और तुम्हारे शहरों के लिए सुरक्षा है।"
नहजुल बलाग़ा की दृष्टि में जब हमारा दुश्मन शांति का आह्वान करे तो हम क्या करें?!
यह शांति वास्तव में एक पूर्ण जिहाद का मीठा परिणाम होती है, जिसमें शहादतें भी समाज की स्थिरता और जनसंख्या वृद्धि का कारण बनती हैं।
लेकिन हज़रत अली ने मालिक अश्तर को शांति की नसीहत करते हुए एक महत्वपूर्ण मुद्दे से भी सचेत किया, फरमाया: وَ لَکِنِ اَلْحَذَرَ کُلَّ اَلْحَذَرِ مِنْ عَدُوِّکَ بَعْدَ صُلْحِهِ فَإِنَّ اَلْعَدُوَّ رُبَّمَا قَارَبَ لِیَتَغَفَّلَ فَخُذْ بِالْحَزْمِ وَ اِتَّهِمْ فِی ذَلِکَ حُسْنَ اَلظَّنّ "लेकिन शांति के बाद दुश्मन से पूरी तरह सावधान और होशियार रहने की आवश्यकता है, क्योंकि अक्सर ऐसा होता है कि दुश्मन निकटता प्राप्त करता है ताकि तुम्हारी असावधानी से लाभ उठाए। अतः सावधानी को ध्यान में रखो और इस संबंध में अच्छी धारणा से काम न लो।"
इमाम (अ) की यह चेतावनी वास्तव में एक क़ुरआनी सिद्धांत है। अल्लाह तआला फरमाता है कि काफिर दुश्मन का स्वभाव संधि तोड़ना है, लेकिन जब तक वे शांति की संधि पर कायम हैं, तुम भी अपनी संधि पर कायम रहो।
इसी कारण अमीरुल मोमिनीन (अ) ने मालिक अश्तर को आगे फरमाया: «وَ إِنْ عَقَدْتَ بَیْنَکَ وَ بَیْنَ عَدُوِّکَ عُقْدَةً أَوْ أَلْبَسْتَهُ مِنْکَ ذِمَّةً فَحُطْ عَهْدَکَ بِالْوَفَاءِ وَ اِرْعَ ذِمَّتَکَ بِالْأَمَانَةِ وَ اِجْعَلْ نَفْسَکَ جُنَّةً دُونَ مَا أَعْطَیْتَ».. "और यदि अपने और दुश्मन के बीच कोई संधि करो, या उसे अपने संरक्षण में पनाह दो, तो फिर संधि को वफादारी से निभाओ, अपनी प्रतिज्ञा को अमानत के साथ पूरा करो, और अपने द्वारा दिए गए वचन की रक्षा के लिए अपने प्राणों को ढाल बना लो।"
यह संक्षिप्त विवरण इस्लाम में युद्ध और शांति का एक सामान्य सिद्धांत है, जिसे उचित अवसरों पर विस्तार से बयान किया जा सकता है।
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